
गौ-रक्षार्थ धर्मयुद्ध यात्रा: राम मंदिर दान चोरी प्रकरण के बीच प्रस्तावित यात्रा पर बढ़ा विवाद, कुछ संत बोले-धार्मिक यात्रा का स्वागत, तो कुछ ने बताया राजनीतिक कार्यक्रम
अयोध्या। राम मंदिर दान चोरी प्रकरण को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच शुक्रवार 17 जुलाई को प्रस्तावित ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की अयोध्या यात्रा को लेकर संत समाज दो धड़ों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। एक ओर कई संत इसे धार्मिक यात्रा बताते हुए उनके स्वागत की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ संत और सामाजिक संगठनों ने यात्रा का विरोध करने का ऐलान किया है। विरोध करने वालों का कहना है कि यदि यात्रा का उद्देश्य धार्मिक न होकर राजनीतिक हुआ तो इसका विरोध किया जाएगा।
प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती 17 जुलाई को अयोध्या पहुंचेंगे। उनकी यात्रा जिले की पांचों विधानसभा क्षेत्रों से होकर जिला मुख्यालय तक निकाली जाएगी। यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर स्वागत सभाएं, संतों से मुलाकात तथा धार्मिक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। हालांकि उनके आगमन से पहले ही यात्रा को लेकर बहस तेज हो गई है।
दरअसल, हाल के दिनों में राम मंदिर दान चोरी प्रकरण को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं। इसी बीच शंकराचार्य की प्रस्तावित यात्रा को कुछ लोग उस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं। इसी कारण यात्रा को लेकर धार्मिक और राजनीतिक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
समाजसेवी मुकुंद माधव त्रिपाठी ने शंकराचार्य की यात्रा का विरोध करने की घोषणा करते हुए कहा कि अयोध्या की धार्मिक मर्यादा और संत परंपरा का राजनीतिक उपयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि कोई संत धार्मिक उद्देश्य से अयोध्या आता है तो उसका सम्मान होना चाहिए, लेकिन धर्म की आड़ में राजनीति करने का प्रयास उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि इसी मुद्दे को लेकर विरोध दर्ज कराया जाएगा।
वहीं, संत समाज के एक वर्ग ने इस यात्रा का समर्थन किया है। संत वरुण दास महाराज ने कहा कि अयोध्या भगवान श्रीराम की नगरी है और यहां आने का अधिकार प्रत्येक संत, महात्मा और श्रद्धालु को है। उन्होंने कहा कि यदि शंकराचार्य धार्मिक यात्रा पर आ रहे हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए। किसी भी संत के आगमन को विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
राम मंदिर आंदोलन से जुड़े स्वामी करपात्री जी महाराज ने भी संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि धार्मिक यात्राओं का सदैव सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि यात्रा का उद्देश्य केवल धर्म और सनातन परंपरा का प्रचार-प्रसार है तो उसका स्वागत किया जाएगा, लेकिन यदि यात्रा का उद्देश्य राजनीतिक संदेश देना हुआ तो उसका विरोध स्वाभाविक माना जाएगा।
दूसरी ओर संत सीताराम दास ने यात्रा को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा कि संत समाज का एक बड़ा वर्ग इसका विरोध कर रहा है। उनका आरोप है कि धार्मिक मंचों का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अयोध्या की गरिमा बनाए रखना सभी संतों की जिम्मेदारी है।
यात्रा को लेकर प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क है। चूंकि स्वागत और विरोध दोनों की घोषणाएं सामने आ चुकी हैं, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष तैयारी की जा रही है। प्रस्तावित यात्रा मार्ग पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती किए जाने की संभावना है, ताकि किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और किसी को भी शांति व्यवस्था भंग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
बताते चलें कि ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती 17 जुलाई को अयोध्या दौरे पर आ रहे हैं। ‘गौ-रक्षार्थ धर्मयुद्ध यात्रा’ के तहत वे जिले की सभी पांचों विधानसभाओं का दौरा करेंगे, जिसका मुख्य उद्देश्य गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित करवाना और राम मंदिर ट्रस्ट के चंदे में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाना है।
फिलहाल शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की अयोध्या यात्रा धार्मिक विमर्श से अधिक राजनीतिक चर्चाओं का विषय बनती दिखाई दे रही है। अब सभी की निगाहें 17 जुलाई को होने वाली यात्रा और उसके दौरान होने वाली गतिविधियों पर टिकी हैं। यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि यात्रा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित रहती है या इसके राजनीतिक मायने आगे भी चर्चा का विषय बनते हैं।

